हम शज़र से नहीं साये से वफ़ा करते है…

हम शज़र से नहीं साये से वफ़ा करते है
यही है वजह कि हम लोग दगा करते है,

हम परिंदे है हमें क़ैद में रखना वरना
पर निकलते ही हवाओ में उड़ा करते है,

अपनी तक़दीर भी है रास्तो से मिलती जुलती
किसी तक दो से बिछड़ने को मिला करते है,

हमको मालूम तो होती है हकीक़त लेकिन
यार जो भी कहे सच मान लिया करते है,

ज़िन्दगी हम कहाँ जीते है ये जीती है हमें
हम तो बस गर्दिश ए अय्याम जिया करते है,

कितनी ख्वाहिश थी तुझे ज़ीस्त मनाया जाए
और मनाने में तुझे और खफ़ा करते है,

हक़ यही है कि जिए और यहाँ जीने दे
और यही काम कहाँ लोग किया करते है,

हमने बस लफ्ज़ो का मलबूस दिया है तुमको
दर्द ओ गम रंज ओ अलम लोग अता करते है..!!


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