रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर
जिस ने अपनी ज़िंदगी को खेल समझा उम्र भर,
तुम अमीर ए शहर के घर को जला कर देखना
घर में हो जाएगा मुफ़्लिस के उजाला उम्र भर,
ऐसा लगता है कि अब वो क़ब्र तक जाएगी साथ
दिल के ख़ानों में निहाँ थी जो तमन्ना उम्र भर,
क़र्ज़ मेरी क़ौम वो कैसे चुकाएगी भला
सूद ख़ुद को बेच कर जिस का उतार उम्र भर,
जानता हूँ मुझ को डस लेगा वो मार ए आस्तीं
जिस को अपना ख़ूँ पिला कर मैं ने पाला उम्र भर,
ज़िंदगी ने’मत थी जिस को पा के तुम ख़ुश थे सबीह
अब कहो क्या ज़िंदगी से तुम ने पाया उम्र भर..!!
~सबीहुद्दीन शोऐबी
गिरने वाली है बहुत जल्द ये सरकार हुज़ूर
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