सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए

सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए
अपने अश्कों से तेरा दामन भिगोना चाहिए,

ज़िंदगी की राह पर कैसे अकेले हम चलें
इस सफ़र में हमसफ़र कोई तो होना चाहिए,

दिल बहुत छोटा है मेरा और जहाँ में ग़म बहुत
मैं परेशाँ हूँ किसे कैसे समोना चाहिए,

बच्चा रोता है मगर रोता है वो तक़दीर पर
माँ समझती है कि मुन्ने को खिलौना चाहिए,

अजनबी बिस्तर ये बोला रात के पिछले पहर
ऐ सबीह ए बे वतन अब तुझ को सोना चाहिए..!!

~सबीहुद्दीन शोऐबी

यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता

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