किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता

किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता
यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता,

मोहब्बत का सिला ईसार का हासिल नहीं मिलता
वो नज़रें बार हा मिलती हैं लेकिन दिल नहीं मिलता,

तुम्हारा रूठना तम्हीद थी अफ़्साना ए ग़म की
ज़माना हो गया हम से मिज़ाज ए दिल नहीं मिलता,

जहाँ तक देखता हूँ मैं जहाँ तक मैं ने समझा है
कोई तेरे सिवा तारीफ़ के क़ाबिल नहीं मिलता,

हरम की मंज़िलें हों या सनम ख़ाने की राहें हों
ख़ुदा मिलता नहीं जब तक मक़ाम ए दिल नहीं मिलता,

मुसाफ़िर अपनी मंज़िल पर पहुँच कर चैन पाते हैं
वो मौजें सर पटकती हैं जिन्हें साहिल नहीं मिलता,

हम अपना ग़म लिए बैठे हैं उस बज़्म ए तरब में भी
किसी नग़्मे से अब मख़मूर साज़ ए दिल नहीं मिलता..!!

~मख़मूर देहलवी

दुई का तज़्किरा तौहीद में पाया नहीं जाता

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1 thought on “किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता”

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