मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी
कभी फ़ुर्क़त कभी इस दर्जा क़ुर्बत मार डालेगी,
ग़रीब ए शहर का क्या इस को ग़ुर्बत मार डालेगी
अमीर ए शहर को दौलत की चाहत मार डालेगी,
सड़क पर पाया जाएगा किसी दिन मेरा भी लाशा
मुझे सच बोलते रहने की आदत मार डालेगी,
ये तेरी दस्त गीरी एक दिन ले डूबेगी मुझ को
मेरी हर बात पर तेरी हिमायत मार डालेगी,
अगर चाहत की शिद्दत दिन ब दिन बढ़ती रही यूँ ही
सबीह ए नीम जाँ तुझ को मोहब्बत मार डालेगी..!!
~सबीहुद्दीन शोऐबी
आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला
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