कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ
हम भी न डूब जाएँ कहीं ना ख़ुदा के साथ,
दिल की तलब पड़ी है तो आया है याद अब
वो तो चला गया था किसी दिलरुबा के साथ,
जब से चली है आदम ओ यज़्दाँ की दास्ताँ
हर बावफ़ा का रब्त है एक बेवफ़ा के साथ,
मेहमान मेज़बाँ ही को बहका के ले उड़ा
ख़ुश्बू ए गुल भी घूम रही है सबा के साथ,
पीर ए मुग़ाँ से हम को कोई बैर तो नहीं
थोड़ा सा इख़्तिलाफ़ है मर्द ए ख़ुदा के साथ,
शैख़ और बहिश्त कितने तअ’ज्जुब की बात है
या रब ये ज़ुल्म ख़ुल्द की आब ओ हवा के साथ,
पढ़ता नमाज़ मैं भी हूँ पर इत्तिफ़ाक़ से
उठता हूँ निस्फ़ रात को दिल की सदा के साथ,
महशर का ख़ैर कुछ भी नतीजा हो ऐ ‘अदम’
कुछ गुफ़्तुगू तो खुल के करेंगे ख़ुदा के साथ..!!
~अब्दुल हमीद अदम
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