खींच कर रात की दीवार पे मारे होते
मेरे हाथों में अगर चाँद सितारे होते,
यार ! क्या जंग थी जो हार के तुम कहते हो
जीत जाते तो ख़सारे ही ख़सारे होते,
ये जो आँसूं हैं मेरी पलकों पे पानी जैसे
उसकी आँखों से उभरते तो सितारे होते,
ये जो हम लोग हैं एहसास में जलते हुए लोग
हम ज़मीं ज़ाद न होते तो सितारे होते,
तुमको इंकार की खू मार गई है वाहिद
हर भंवर से न उलझते तो किनारे होते..!!
~वाहिद एजाज़
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