मेरे दिल के अरमां रहे रात जलते
रहे सब करवट पे करवट बदलते,
यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत की हमने
बहुत रोया है दिल दहलते दहलते,
लगी दिल की है जख्म जाता नहीं ये
बहल जाएगा दिल बहलते बहलते,
तड़प बेवफा मत जमाने की खातिर
चल चले कहीं और टहलते टहलते,
अभी इश्क का ये तो पहला कदम है
अभी जख्म खाने है कई चलते चलते,
है कमज़ोर सीढ़ी मुहब्बत की लेकिन
ये चढ़नी भी पड़ेगी, संभलते संभलते,
ये ज़ीस्त अब उजाले से डरने लगी है
हुई शाम क्यूँ ये दिन के यूँ ढलते ढलते,
जवाब आया न तो मुहब्बत क्या करते
बुझा दिल का आखिर दिया जलते जलते,
न घबरा तेरी जीत ही ‘हीर’ होगी
वो पिघलेंगे एक दिन पिघलते पिघलते..!!
~हरकीरत हीर
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