मुबारक़ हो ! अहल ए वतन क्या ख़ूब
इज्ज़त बख्शी है आलमी अखबारों ने
सोने की चिड़िया को भी इन लोगो ने
खड़ा कर दिया भूखे नंगो की क़तारो में
खुदगर्ज़ी में आईन ए वतन बदल डाले
इन नये ज़म्हुरियत के अलमबरदारो ने
सील दिए हर लब जो थे सच बोलने वाले
दौर ए ज़म्हुरियत के ज़दीद पैरोकारो ने..!!
~नवाब ए हिन्द
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संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है

गूँगे लफ़्ज़ों का ये बेसम्त सफ़र मेरा है

ख़्वाबों की तरह गोया बिखर जाएँगे हम भी

किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे

दौर ए ज़दीद में गुनाह ओ सवाब बिकते है

कर्ब ए फ़ुर्क़त रूह से जाता नहीं…

हमने कैसे यहाँ गुज़ारी है….

दस्तरस में न हो हालात तो फिर क्या कीजिए

वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे

दूर तक छाए थे बादल और कहीं..
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