क्या बताते हैं इशारात तुम्हें क्या मा’लूम…

क्या बताते हैं इशारात तुम्हें क्या मा’लूम
कितने मश्कूक हैं हालात तुम्हें क्या मा’लूम ?

ये उलझते हुए जज़्बात तुम्हें क्या मा’लूम
हैं यही बाइ’स ए आफ़ात तुम्हें क्या मा’लूम ?

एक आँगन को फ़क़त अपने सजाने के लिए
कितनी झीलें हैं मुहिम्मात तुम्हें क्या मा’लूम ?

राज़ हस्ती का है क्या मक़्सद ए हस्ती क्या है
हल तलब हैं ये सवालात तुम्हें क्या मा’लूम ?

एक खनकती हुई मिट्टी हो जिला बख़्शी है
कितनी प्यारी है ये सौग़ात तुम्हें क्या मा’लूम ?

दिन गुज़रता है किसी और बहाने से मगर
कैसे कटती है मेरी रात तुम्हें क्या मा’लूम ?

बेच कर सारा असासा करो शादी ‘मोहसिन’
यूँ ही आती नहीं बारात तुम्हें क्या मा’लूम ?

~दाऊद मोहसिन

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