दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो
कोई तो हो जो मेरी वहशतों का साथी हो,
मैं उससे झूठ भी बोलूँ तो मुझसे सच बोले
मेरे मिज़ाज के सब मौसमों का साथी हो,
मैं उसके हाथ न आऊँ वो मेरा हो के रहे
मैं गिर पड़ूँ तो मेरी पस्तियों का साथी हो,
वो मेरे नाम की निस्बत से मोतबर ठहरे
गली गली मेरी रुस्वाइयों का साथी हो,
करे कलाम जो मुझसे तो मेरे लहजे में
मैं चुप रहूँ तो मेरे तेवरों का साथी हो,
मैं अपने आप को देखूँ वो मुझको देखे जाए
वो मेरे नफ़्स की गुमराहियों का साथी हो,
वो ख़्वाब देखे तो देखे मेरे हवाले से
मेरे ख़याल के सब मंज़रों का साथी हो..!!
~इफ़्तिख़ार आरिफ़
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