अंदाज़ हू ब हू तेरी आवाज़ ए पा का था
देखा निकल के घर से तो झोंका हवा का था,
उस हुस्न ए इत्तिफ़ाक पे लुट कर भी शाद हूँ
तेरी रज़ा जो थी वो तकाज़ा वफ़ा का था,
दिल राख हो चुका तो चमक और बढ़ गई
ये तेरी याद थी कि अमल कीमिया का था,
उस रिश्ते ए लतीफ़ के इसरार क्या खिलें
तू सामने था और तसव्वुर ख़ुदा का था,
छुप छुप के रोऊँ और सर ए अंजुमन हँसू
मुझको ये मशविरा मेरे दर्द ए आशना का था,
उठा अज़ीब तसाद से इन्सान का ख़मीर
आदि फ़ना का था तू पुजारी बक़ा का था,
टूटा तो कितने आईने खानों पे ज़द पड़ी
अटका हुआ गले में जो पत्थर सदा का था,
हैरान हूँ कि वार से कैसे बचा हूँ मैं
वो शख्स तो ग़रीब ओ गय्यूर इन्तेहा का था..!!
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