दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती

दलाएल से ख़ुदा तक अक़्ल ए इंसानी नहीं जाती
वो एक ऐसी हक़ीक़त है जो पहचानी नहीं जाती,

इसे तो राह में अरबाब ए हिम्मत छोड़ देते हैं
किसी के साथ मंज़िल तक तन आसानी नहीं जाती,

किसे मिलती हैं वो आँखें मोहब्बत में जो रोती हैं
मुबारक हैं वो आँसू जिन की अर्ज़ानी नहीं जाती,

उभरता ही नहीं दिल डूब कर बहर ए मोहब्बत में
जब आ जाती है इस दरिया में तुग़्यानी नहीं जाती,

गदाई में भी मुझ पर शान ए इस्तिग़ना बरसती है
मेरे सर से हवा ए ताज ए सुल्तानी नहीं जाती,

मुक़ीम ए दिल हैं वो अरमान जो पूरे नहीं होते
ये वो आबाद घर है जिस की वीरानी नहीं जाती,

कुछ ऐसा परतव ए हुस्न ए अज़ल ने कर दिया रौशन
क़यामत तक तो अब ज़र्रों की ताबानी नहीं जाती,

कुछ ऐसे बरगुज़ीदा लोग भी हैं जिन के हाथों से
छुड़ा कर अपना दामन पाक दामनी नहीं जाती,

हुजूम ए यास में भी ज़िंदगी पर मुस्कुराता हूँ
मुसीबत में भी मेरी ख़ंदा पेशानी नहीं जाती..!!

~मख़मूर देहलवी

तुम से वाबस्ता है मेरी मौत मेरी ज़िंदगी

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