जब तेरा हुक्म मिला तर्क ए मुहब्बत कर दी…

जब तेरा हुक्म मिला तर्क ए मुहब्बत कर दी
दिल मगर उसपे वो धड़का कि क़यामत कर दी,

तुझसे किस तरह मैं इज़हार ए तमन्ना करता
लफ्ज़ सोचा तो मायने ने बग़ावत कर दी,

मैं तो समझा था कि लौट आते है जाने वाले
तूने जा कर तो जुदाई मेरी क़िस्मत कर दी,

तुझको पूजा है कि असनाम परस्ती की है
मैंने वहदत के मुफाहीम की कसरत कर दी,

मुझको दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है
तेरी उल्फ़त ने मुहब्बत मेरी आदत कर दी,

पूछ बैठा हूँ मैं तुझसे तेरे कूचे का पता
तेरे हालात ने कैसी तेरी सूरत कर दी,

क्या तेरा ज़िस्म तेरे हुस्न की हिद्दत में जला
राख किसने तेरी सोने की सी रंगत कर दी..!!


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply