शहर मेरा हुजरा ए आफ़ात है
सर पे सूरज और घर में रात है,
सुर्ख़ थे चेहरे बदन शादाब थे
ये अभी दो चार दिन की बात है,
फूटने ही वाला है चश्मा यहाँ
सारी दुनिया अर्सा ए अर्फ़ात है,
वो तो है बेचैन मिलने के लिए
दरमियाँ ख़ुद मेरी अपनी ज़ात है,
मैं हूँ अंजुम आफ़ियात ए नीम शब
मुझ से बरगश्ता अँधेरी रात है..!!
~अशफ़ाक़ अंजुम
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