वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी…

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी जाऊँ मैं
घूम फिर आया हूँ अपना शहर तेरा गाँव मैं,

किस को रास आया है इतनी देर तक का जागना
वो जो मिल जाए तो उसको भी यही समझाऊँ मैं,

अब तो आँखों में उतर आई है दिल की वहशतें
आईना देखूँ तो अपने आप से डर जाऊँ मैं,

कुछ तो बता ऐ मातमी रातों की धुँधली चाँदनी !
भूलने वाले को आख़िर किस तरह याद आऊँ मैं,

अब कहाँ वो दिल के सहरा में बहलता ही न था
अब तो अपने घर की तन्हाई से भी घबराऊँ मैं,

याद कर के तेरे लौट आने के वायदे की घड़ी
ख़ुद को एक मासूम बच्चे की तरह बहलाऊँ मैं,

मेरे ख्वाबों ने तराशा था तेरा उजला बदन
आ तुझे अब फ़िक्र की पोशाक़ भी पहनाऊँ मैं,

भला किस लिए किसी बे महर को अपना कहूँ
दिल के शीशे को किसी पत्थर से क्यूँ टकराऊँ मैं..!!


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