मोहब्बत में शब ए तारीक ए हिज्राँ कौन देखेगा ?

मोहब्बत में शब ए तारीक ए हिज्राँ कौन देखेगा
हमीं देखेंगे ये ख़्वाब ए परेशाँ कौन देखेगा ?

इन आँखों से तजल्ली को दरख़्शाँ कौन देखेगा
उठा भी दो नक़ाब ए रू ए ताबाँ कौन देखेगा ?

यही एक रात है बस काएनात ए ज़िंदगी अपनी
सहर होती हुई ऐ शाम ए हिज्राँ कौन देखेगा ?

चमन में गिर रही हैं बिजलियाँ शाख़ ए नशेमन पर
यहाँ तक अपनी बर्बादी का सामाँ कौन देखेगा ?

बसाना ही पड़ेगा एक न एक दिन ख़ाना ए दिल को
बने फिरते हो यूसुफ़ शाम ए ज़िंदाँ कौन देखेगा ?

हक़ीक़त में तक़ाज़ा भी यही है पर्दादारी का
रहो तुम आँख के पर्दों में पिन्हाँ कौन देखेगा ?

कुछ ऐसा हो दम ए आख़िर न आएँ वो अयादत को
उन्हें अपने किए पर यूँ पशेमाँ कौन देखेगा ?

मुझी पर आएगा इल्ज़ाम मेरी पाइमाली का
तेरी रफ़्तार को ऐ फ़ित्ना सामाँ कौन देखेगा ?

जो ग़ुंचे कल खिले थे आज वो मुरझाए जाते हैं
मेरी नज़रों से रंग ए बज़्म ए इम्काँ कौन देखेगा ?

यही अब भी सदाएँ वादी ए ऐमन से आती हैं
कहाँ हैं तालिब ए दीदार ए जानाँ कौन देखेगा ?

नफ़स के साथ ही क़ैद ए त’अल्लुक़ टूट जाती है
पलट कर फिर सू ए गोर ए ग़रीबाँ कौन देखेगा ?

अज़ाब ए हश्र से तू क्यों डराता है मुझे वा’इज़
तुझे मा’लूम भी है फ़र्द ए इस्याँ कौन देखेगा ?

ये दुनिया है हँसा करती है औरों की मुसीबत पर
तेरा रोना यहाँ ऐ चश्म ए गिर्यां कौन देखेगा ?

चलो मख़मूर तन्हाई में शग़्ल ए मयकशी होगा
छुपा कर ले चलो पीने का सामाँ कौन देखेगा..??

~मख़मूर देहलवी

मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है

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