एक मुसलसल से इम्तेहान में हूँ

एक मुसलसल से इम्तेहान में हूँ
जब से रब मैं तेरे जहाँ में हूँ,

सिर्फ़ इतना सा है क़ुसूर मेरा !
मैं नहीं वो हूँ जिस गुमाँ में हूँ,

कौन पहुंचा है आसमानों तक
एक ज़िद्दी सी बस उड़ान में हूँ,

जिस खता ने ज़मीन पर पटका
ढीठ ऐसा, उसी ध्यान में हूँ,

अपने किस्से में भी यूँ लगता है
मैं किसी और दास्तान में हूँ.

दर ओ दीवार भी नहीं सुनते
इतना तन्हा मैं उस मकान में हूँ,

ज़िन्दगी एक लिहाफ़ मुक़म्मल है
सर्द मौसम है खींच तान में हूँ,

तोलती हैं मुझे यूँ सब नज़रें
जैसे मैं जींस हूँ दुकान में हूँ,

कोई समझा न मेरी बात अबरक
मैं किसी और ही ज़बान में हूँ..!!

~इत्बाफ़ अबरक


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