कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है

कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
आते जाते रात और दिन में कुछ तो जी बहलाने को है,

चलो यहाँ से अपनी अपनी शाख़ों पे लौट आए परिंदे
भूली बिसरी यादों को फिर तन्हाई दोहराने को है,

दो दरवाज़े एक हवेली आमद रुख़्सत एक पहेली
कोई जा कर आने को है कोई आ कर जाने को है,

दिन भर का हंगामा सारा शाम ढले फिर बिस्तर प्यारा
मेरा रस्ता हो या तेरा हर रस्ता घर जाने को है,

आबादी का शोर शराबा छोड़ के ढूँडो कोई ख़राबा
तन्हाई फिर शम्अ जला कर कोई हर्फ़ सुनाने को है..!!

~निदा फ़ाज़ली


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