खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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अज़ीब कर्ब में गुज़री जहाँ जहाँ गुज़री

कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते…

न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले…

सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते…

पहलू में बैठ कर वो पाते क्या ?

सवालो के बदले लहज़े ऐसे…


















