खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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पानी के उतरने में अभी वक़्त लगेगा

नख्ल ए ममनूअ के रुख दोबारा गया

ज़रीदे में छपी है एक ग़ज़ल दीवान जैसा है…

ख़ून से लिखता है तावीज़ ए अजल काग़ज़ पर

कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ

कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए

हुस्न ए मह गरचे ब हंगाम ए कमाल अच्छा है…

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से…
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