खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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खून में डूबी सियासत नहीं देखी जाती…

किस से इज़हार ए मुद्दआ कीजे

हिज़ाब तेरे चेहरे पर मैं सजा दूँ…

तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे…

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई…

अज़ीब कर्ब में गुज़री जहाँ जहाँ गुज़री

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है…

बज़्म ए तकल्लुफ़ात सजाने में रह गया

कौन आता है बुझाने प्यास प्यासा देख कर

जुदाई रूह को जब इश्तिआल देती है



















