खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो

एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ

मेरे दोस्त, ऐ मेरे प्यारे अभी बात है अधूरी…

रखते हैं दुश्मनी भी जताते हैं प्यार भी

ये न समझो ये ख्याल है मेरा…

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

क्या कहते क्या जी में था

अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें

अल्फाज़ के झूठे बंधन में

बेबसी से हाथ अपने मलने वाले हम नहीं
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