खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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महताब सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक बसर हैं

मेरी आँखों के समुंदर में जलन कैसी है

ऐ लिखने वाले आख़िर तू ही क्यूँ…

तुझे है मश्क़ ए सितम का मलाल वैसे ही

हमने कैसे यहाँ गुज़ारी है….

ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है…

मर चुका हूँ कई बार फिर भी कई..

कुछ भी था सच के तरफ़दार हुआ…

किस को रौशन बना रहे हो तुम

जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में
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