हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में

हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में
आज़माएँ लोगों को ख़ूब आज़माने में,

दो घड़ी के साथी को हमसफ़र समझते हैं
किस क़दर पुराने हैं हम नए ज़माने में,

तेरे पास आने में आधी उम्र गुज़री है
आधी उम्र गुज़रेगी तुझ से ऊब जाने में,

एहतियात रखने की कोई हद भी होती है
भेद हम ने खोले हैं भेद को छुपाने में,

ज़िंदगी तमाशा है और इस तमाशे में
खेल हम बिगाड़ेंगे खेल को बनाने में..!!

~आलम ख़ुर्शीद


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply