चमन है मक़्तल ए नग़्मा अब और क्या कहिए
बस एक सुकूत का आलम जिसे नवा कहिए,
असीर ए बंद ए ज़माना हूँ साहबान ए चमन
मेरी तरफ़ से गुलों को बहुत दुआ कहिए,
यही है जी में कि वो रफ़्ता ए तग़ाफुल ओ नाज़
कहीं मिले तो वही क़िस्सा ए वफ़ा कहिए,
उसे भी क्यूँ न फिर अपने दिल ए ज़बूँ की तरह
ख़राब ए काकुल ओ आवारा ए अदा कहिए,
ये कू ए यार ये ज़िंदाँ ये फ़र्श ए मयख़ाना
इन्हें हम अहल ए तमन्ना के नक़्श ए पा कहिए,
वो एक बात है कहिए तुलू ए सुब्ह ए नशात
कि ताबिश ए बदन ओ शोला ए हिना कहिए,
वो एक हर्फ़ है कहिए उसे हिकायत ए ज़ुल्फ़
कि शिकवा ए रसन ओ बंदिश ए बला कहिए,
रहे न आँख तो क्यूँ देखिए सितम की तरफ़
कटे ज़बान तो क्यूँ हर्फ़ ए ना रवा कहिए,
पुकारिए कफ़ ए क़ातिल को अब मआलिज ए दिल
बढ़े जो नाख़ुन ए ख़ंजर गिरह कुशा कहिए,
पड़े जो संग तो कहिए उसे निवाला ए ज़र
लगे जो ज़ख़्म बदन पर उसे क़बा कहिए,
फ़साना जब्र का यारों की तरह क्यूँ मजरूह ?
मज़ा तो जब है कि जो कहिए बरमला कहिए..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं






























1 thought on “चमन है मक़्तल ए नग़्मा अब और क्या कहिए”