बार ए गम ए हयात उठाया तो रो पड़े
जब ज़ीस्त ने मजाक उड़ाया तो रो पड़े,
रहता है सोगवार ये दिल जाने किस लिए
हमको यही ख्याल जो आया तो रो पड़े,
लहज़े की तल्खियाँ वो सुनी हैं कि बस हमें
जब प्यार से किसी ने बुलाया तो रो पड़े,
फूलों को यूँ ही देख के काँटों के दरम्याँ
हमने भी गम ख़ुशी में मिलाया तो रो पड़े,
तन्हाई के अँधेरे में हमने जो आज शब
यादों का एक चिराग़ जलाया तो रो पड़े,
ढलते ही जा रहे हैं यहाँ रफ़्तगाँ में लोग
हमने भी जब किसी को भूलाया तो रो पड़े,
लिखे गए थे हम किसी सहरा की रेत पर
इन बेरहम हवाओं ने जब मिटाया तो रो पड़े..!!
~अशरफ नक़वी
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