पिछले ज़ख़्मों का इज़ाला न ही…

pichle zakhmon ka izaala

पिछले ज़ख़्मों का इज़ाला न ही वहशत करेगा तुझ से वाक़िफ़ हूँ मेरी जाँ तू मोहब्बत करेगा, मैं

दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ

dard ki dhoop dhale gam ke

दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ देखिए रूह से कब दाग़ पुराने जाएँ, हम को बस

धोखे पे धोखे इस तरह खाते चले गए

dhokhe pe dhokhe is tarah

धोखे पे धोखे इस तरह खाते चले गए हम दुश्मनों को दोस्त बनाते चले गए, हर ज़ख्म ज़िंदगी

हमारे हाफ़िज़े बेकार हो गए साहिब

hamaare haafize bekar ho gaye

हमारे हाफ़िज़े बेकार हो गए साहिब जवाब और भी दुश्वार हो गए साहिब, उसे भी शौक़ था तस्वीर

घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे

ghar se agar nikale

घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे वो गुलाबी कटोरे छलक जाएँगे, हमने अल्फ़ाज़ को आइना कर दिया

एक बेवा की आस लगती है

ek beva ki aas lagti hai

एक बेवा की आस लगती है ज़िंदगी क्यों उदास लगती है, हर तरफ़ छाई घोर तारीकी रौशनी की

ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र…

zaban kuch aur kahti hai

ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है मगर ये ज़िंदगी की रहगुज़र कुछ और कहती

सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश

sino me agar hoti pyar ki

सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश हाथों में निकलती क्यूँ तलवार की गुंजाइश, पिछड़े हुए गाँव

यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं…

yahan shor bachche machaate nahi

यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं परिंदे भी अब गीत गाते नहीं हैं, वफ़ा के फ़लक पर मोहब्बत

ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया

khuddar mere shahar ka faaqon se mar gaya

ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया राशन जो आ रहा था वो अफ़सर के घर गया,