यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं
परिंदे भी अब गीत गाते नहीं हैं,
वफ़ा के फ़लक पर मोहब्बत के तारे
ख़ुदा जाने क्यूँ झिलमिलाते नहीं हैं,
दिलासा न दे यूँ हमें शैख़ सादी
दिलों में समुंदर समाते नहीं हैं
विरासत में वाइ’ज़ लक़ब पाने वाले
मोहल्ले की मस्जिद में जाते नहीं हैं,
मुसव्विर ने तस्वीर-ए-फ़ुर्सत बना कर
कहा वक़्त को हम बचाते नहीं हैं,
ख़स-ओ-ख़ार से घोंसला शह कड़ी पर
अबाबील क्यूँ अब बनाते नहीं हैं,
हमें तुम सिखाओ तुम्हें हम सिखाएँ
सभी काम तो हम को आते नहीं हैं,
ये दुनिया ए दो रंग ओ रोज़ा के मंज़र
कि अबरार अब दिल लुभाते नहीं हैं..!!
~ख़ालिद अबरार