ऐ लिखने वाले आख़िर तू ही क्यूँ…

ऐ लिखने वाले आख़िर तू ही क्यूँ लिखता है ?
है ये दर्द सबको फिर तुझे ही क्यूँ दिखता है ?

माँग के नहीं मिले तो ख़रीद कर के देख ले
सस्ता या फिर महँगा हर कोई तो बिकता है,

गए जाने वाले, चले जाएँगे सब आने वाले भी
उम्र भर सफ़र में आख़िर कौन यहाँ टिकता है ?

भला क्या खेले कोई यहाँ मुहब्बत की बाज़ी ?
ना आँखे रोती है, न तो अब ये दिल सिसकता है,

गर हो साहूकार तो सीना तान कर चला करो
भला यूँ चोरो की तरह साहूकार कब झिझकता है..??

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