दुनियाँ कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है
परदे के पीछे कोई न कोई ज़रूर है,
जाते है लोग जा के फिर आते नहीं कभी
दीवार के उस पार कोई बस्ती ज़रूर है,
मुमकिन नहीं कि दर्द ए मुहब्बत अयाँ न हो
खिलती है जब कली तो महकती ज़रूर है,
ये जानते हुए कि पिघलता है रात भर
ये शमअ का ज़िगर है कि जलती ज़रूर है,
नागिन ही जानिए उसे दुनियाँ है जिसका नाम
लाख आस्तीं में पालिए डसती ज़रूर है,
जाँ दे भी ख़रीदो तो दुनियाँ न आये हाथ
ये मुश्त ए खाक़ कहने को सस्ती ज़रूर है..!!
~नौशाद अली
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