तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए
मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए,
उम्र भर मिलते रहे फिर भी न मिलने पाए
इस तरह मिल कि मुलाक़ात मुकम्मल हो जाए,
दिन में बिखरा हूँ बहुत रात समेटेगी मुझे
तू भी आ जा तो मेरी ज़ात मुकम्मल हो जाए,
नींद बन कर मेरी आँखों से मेरे ख़ूँ में उतर
रतजगा ख़त्म हो और रात मुकम्मल हो जाए,
मैं सरापा हूँ दुआ तू मेरा मक़सूद ए दुआ
बात यूँ कर कि मेरी बात मुकम्मल हो जाए,
अब्र आँखों से उठे हैं तेरा दामन मिल जाए
हुक्म हो तेरा तो बरसात मुकम्मल हो जाए,
तेरे सीने से मेरे सिने में आयात उतरें
सूर ए कश्फ़ ओ करामात मुकम्मल हो जाए,
तुझ को पाए तो ‘वहीद’अपने ख़ुदा को पा ले
काविश ए मारफ़त ए ज़ात मुकम्मल हो जाए..!!
~वहीद अख़्तर
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