क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
तअ’ज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में,
दिल-ए-नाज़ुक पे उस के रहम आता है मुझे ‘ग़ालिब’
न कर सरगर्म उस काफ़िर को उल्फ़त आज़माने में..!!
~मिर्ज़ा ग़ालिब
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं










Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



















