किसी दरबार की आमीन भरी खल्वत में

किसी दरबार की आमीन भरी खल्वत में
ऐन मुमकिन है तुम्हे मेरा पता मिल जाए,

ये भी हो सकता है मैं तुमको मिलूँ या न मिलूँ
लेकिन इस खोज़ में ख़ुद तुमको ख़ुदा मिल जाए,

सख्त बुझदिल है कि जो इश्क़ में थक जाते है
मैं तो हाँ ! तुमसे बिछड़ कर भी तुम्हारा रहूँगा,

कहीं साँसे भी बन जाऊँगा घुटते हुए सीनों की
कही तड़पते हुए दिलो के लिए सहारा रहूँगा..!!

क्या कलीमी से भला इश्क़ कलामी कम है ?
बादशाही न सही ! दिल की गुलामी कम है ?

क्या कम है कि तुम्हे देखूँ, दिखे पूरी दुनियाँ ?
क्या कम है कि लिखूँ इश्क़ पढ़े पूरी दुनियाँ ?

इश्क़ दरबार भी सुनकार भी, सरकार भी इश्क़
इश्क़ तलवार भी आज़ार भी दिलदार भी इश्क़,

इश्क़ हो जाए तो कुछ और कहाँ फिर होता है !
कुछ नहीं होता फिर वहाँ ये इश्क़ जहाँ होता है !


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