ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए

ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए
हँसा है चाक ए पैराहन न क्यूँ चेहरे पे रंग आए ?

बचाते फिरते आख़िर कब तलक दस्त ए अज़ीज़ाँ से
उन्हीं को सौंप कर हम तो कुलाह ए नाम ओ नंग आए,

हँसो मत अहल ए दिल अपनी सी जानो बज़्म ए ख़ूबाँ में
चले आए इधर हम भी बहुत जब दिल से तंग आए,

कहाँ सेहन ए चमन में बात कू ए सर फ़रोशाँ की
इधर से सादा रू निकले उधर से लाला रंग आए,

करो मजरूह तब दार ओ रसन के तज़्किरे हम से
जब उस क़ामत के साए में तुम्हें जीने का ढंग आए..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं

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