जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं

जल्वा ए गुल का सबब दीदा ए तर है कि नहीं
मेरी आहों से बहाराँ की सहर है कि नहीं,

राह ए गुम कर्दा हूँ कुछ उस को ख़बर है कि नहीं
उस की पलकों पे सितारों का गुज़र है कि नहीं,

दिल से मिलती तो है एक राह कहीं से आ कर
सोचता हूँ ये तेरी राहगुज़र है कि नहीं,

तेज़ हो दस्त ए सितम दे भी शराब ऐ साक़ी
तेग़ गर्दन पे सही जाम सिपर है कि नहीं,

मैं जो कहता था सो ऐ रहबर ए कोताह ख़िराम
तेरी मंज़िल भी मेरी गर्द ए सफ़र है कि नहीं,

अहल ए तक़दीर ये है मोजज़ा ए दस्त ए अमल
जो ख़ज़फ़ मैं ने उठाया वो गुहर है कि नहीं,

देख कलियों का चटकना सर ए गुलशन सय्याद
सब की और सब से जुदा अपनी डगर है कि नहीं,

हम रिवायात के मुनकिर नहीं लेकिन मजरूह
ज़मज़मा संज मेरा ख़ून ए जिगर है कि नहीं..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

अदा ए तूल ए सुख़न क्या वो इख़्तियार करे

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