फ़ैज़ और फ़ैज़ का ग़म भूलने वाला है कहीं
मौत ये तेरा सितम भूलने वाला है कहीं,
हम से जिस वक़्त ने वो शाह ए सुख़न छीन लिया
हम को वो वक़्त ए अलम भूलने वाला है कहीं,
तेरे अश्क और भी चमकाएँगी यादें उस की
हम को वो दीदा ए नम भूलने वाला है कहीं,
कभी ज़िंदाँ में कभी दूर वतन से ऐ दोस्त
जो किया उस ने रक़म भूलने वाला है कहीं,
आख़िरी बार उसे देख न पाए जालिब
ये मुक़द्दर का सितम भूलने वाला है कहीं..!!
~हबीब जालिब
आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह
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