जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग
क्या से क्या हो जाते हैं अक्सर जाने पहचाने लोग,
मुँह से बात निकलते ही सौ गढ़ लेंगे अफ़्साने लोग
बैठे बैठे बुन लेते हैं कैसे ताने बाने लोग,
दैर ओ हरम ही से दुनिया को होश की राहें मिलती हैं
दैर ओ हरम के नाम पे ही बन जाते हैं दीवाने लोग,
कोई उन्हें भी तो समझाए कोई कुछ उन से भी कहे
जब देखो तब आ जाते हैं मुझ को ही समझाने लोग,
हज़रत ए ज़ाहिद समझा दें तो तौबा कर लूँ मैं भी रईस
बादल क्यों छा जाते हैं जब जाते हैं मयख़ाने लोग..!!
~रईस रामपुरी
दिल में मेरे अरमान बहुत हैं
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं










Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.




















1 thought on “जैसे कोई रब्त नहीं हो जैसे हों अनजाने लोग”