सुना है जब से कि तुम को भी ग़म गवारा है
ख़याल अब हमें अपना नहीं तुम्हारा है,
कभी जो सुनता हूँ आवाज़ ए बाज़गश्त अपनी
तो सोचता हूँ कि तुम ने मुझे पुकारा है,
कहाँ गई मेरी ज़िंदा दिली मैं क्यों सोचूँ ?
ये फ़र्ज़ मेरा नहीं दोस्तो तुम्हारा है,
ज़माने भर को अगर गुल तो हम को ख़ार अज़ीज़
ज़माने भर से अलग मुद्द’आ हमारा है,
ये रात अब यूँही काँटों पे लोटना है रईस
कि तू ने फूलों के साए में दिन गुज़ारा है..!!
~रईस रामपुरी
हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है
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