नहीं होती अगर बारिश तो पत्थर हो गए होते
ये सारे लहलहाते खेत बंज़र हो गए होते,
तेरे दामन ने सरे शहर हो सैलाब से रोका
नहीं तो मेरे ये आँसू समंदर हो गए होते,
तुम्हे अहल ए सियासत ने कहीं का भी नहीं रखा
हमारे साथ रहते तो सुखनवर हो गए होते,
अगर आदाब कर लेते तो मसनद मिल गई होती
अगर लहज़ा बदल लेते गवर्नर हो गए होते..!!
~मुनव्वर राना
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