मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो

मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो
क़ौम की कैसी भी पस्ती, आपकी बला से हो जो हो,

आप तो ख़ुद से भी कभी, ग़ुस्सा नहीं करते जनाब
होशियारी फिर शाह की, आपकी बला से हो जो हो,

आप बैठेंगे कभी, मसनद की बग़ल में अन क़रीब
दूसरे की क्या है हस्ती, आपकी बला से हो जो हो,

सब ख़ला में फिर उड़ेंगे, क़ौम के हैं जो सरबराह
शहर हो कि कोई बस्ती, आपकी बला से हो जो हो,

शाह के रहम ओ करम से, आपको सब हासिल हुआ
और हासिल सरपरस्ती, आपकी बला से हो जो हो,

तुग़्यानी को दिलकश बड़ा, मंज़र समझते हैं आप
डूबती उसमें है कश्ती, आपकी बला से हो जो हो,

फ़र्क़ आदम-ज़ात का, आदम ज़ाद से मिटता नहीं
आपकी है ज़ात ऊँची, आपकी बला से हो जो हो..!!

~विनोद चंदोला

पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो

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