मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दादार ए राज़ होती है
जो दिल पर चोट लगती है वो बे आवाज़ होती है,
ब ज़ाहिर नग़्मा ए हस्ती भला मालूम होता है
मगर हर साँस आवाज़ ए शिकस्त ए साज़ होती है,
दिलों के मेल में रुस्वाइयाँ भी हो के रहती है
कि टकराते हैं जब साग़र तो एक आवाज़ होती है,
न हँसने का कोई मक़्सद न रोने का कोई मतलब
वो दीवाने हैं जिन की ज़िंदगी एक राज़ होती है,
छुपाए से लब ओ लहजा मोहब्बत का नहीं छुपता
ज़माने से बहुत बदली हुई आवाज़ होती है,
मैं रोता हूँ तो कोई दाद अश्कों की नहीं देता
मैं हँसता हूँ तो दुनिया गोश बर आवाज़ होती है,
गुनहगारों को ऐ शौक़ एक यही तस्कीन क्या कम हो
ख़ता अश्कों से तर हो कर नज़र अंदाज़ होती है..!!
~विशनू कुमार शौक
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