इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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किताब सादा रहेगी कब तक ?

एक रात आती है एक रात जाती है

उठाओ संग कि हम में सनक बहुत है अभी

ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है

गुफ़्तुगू जो होती है साल ए नौ से अम्बर की

एक हकीकी ख़्वाब हुआ तेरा साथ सराब हुआ…

जुज़ तेरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे

वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है…

समझता खूब है वो भी बयान की कीमत…

चलो बाद ए बहारी जा रही है



















