इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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दिल ए गुमशुदा ! कभी मिल ज़रा…

वो जो था वो कभी मिला ही नहीं

ख़्वाबों की तरह गोया बिखर जाएँगे हम भी

शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें

खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में

कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ

हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे

मैं सुन रहा हूँ जो दुनियाँ सुना रही है मुझे
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