इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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जब तेरे नैन मुस्कुराते हैं

कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ

बदले बदले मेरे ग़म ख़्वार नज़र आते हैं

अमीरों को मिलती है हर जगह इज्ज़त

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस

कहीं पे सूखा कहीं चारों सिम्त पानी है



















