इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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वतन से दूर आ कर जो बड़ी दौलत कमाते है…

तर्क ए ग़म गवारा है और न ग़म का यारा है

बात इधर उधर तो बहुत घुमाई जा..

होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे

मेज़ चेहरा किताब तन्हाई

तलाश कर न ज़मीं आसमान से बाहर

उदासी आसमाँ है दिल मेरा कितना अकेला है

इस बार तो ग़ुरूर ए हुनर भी निकल गया

छुप गया ख़ुर्शीद ए ताबाँ आई दीवाली की शाम

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
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