कोई जो रहता है रहने दो मस्लहत का शिकार

कोई जो रहता है रहने दो मस्लहत का शिकार
चलो कि जश्न ए बहाराँ मनाएँगे सब यार,

चलो निखारेंगे अपने लहू से आरिज़ ए गुल
यही है रस्म ए वफ़ा और मनचलों का शिआ’र,

जो ज़िंदगी में है वो ज़ह्र हम भी पी डालें
चलो हटाएँगे पलकों से रास्तों के ख़ार,

यहाँ तो सब ही सितम दीदा ग़म गज़ीदा हैं
करेगा कौन भला ज़ख़्म हा ए दिल का शुमार,

चलो कि आज रखी जाएगी निहाद ए चमन
चलो कि आज बहुत दोस्त आएँगे सर ए दार..!!

~अख़्तरुल ईमान

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी

Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

1 thought on “कोई जो रहता है रहने दो मस्लहत का शिकार”

Leave a Reply