खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता…

कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ…

लोक गीतों का नगर याद आया

ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम

पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता

ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है

आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है…

सूरज उस के घर की कोई खिड़की है

मेंरी सदा है गुल ए शम् ए शाम ए आज़ादी

ये न समझो ये ख्याल है मेरा…



















