खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं

सहर ने मसर्रत का नग़्मा सुनाया

आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे

सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की

कभी पहली बार स्कूल जाने में डर लगता था

तुम साथ चले थे तो मेरे साथ चला दिन

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

शिकवा भी ज़फ़ा का कैसे करे एक नाज़ुक सी दुश्वारी है…

जाने क्यूँ बर्बाद होना चाहता है

बरहम कभी क़ासिद से वो महबूब न होता

ये आसमां ज़रूरी है तो ज़मीं भी ज़रूरी है



















