खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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हमेशा साथ रहने की आदत कुछ नहीं होती

हों जो सारे दस्त ओ पा हैं ख़ूँ मैं नहलाए हुए

ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में तमाम तेरी हिकायतें हैं…

हमारी वजह ए ज़वाल क्या है ? सवाल ये है

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

बाम पर आता है हमारा चाँद

ये बहार का ज़माना ये हसीं गुलों के साए

आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है…

दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे



















