करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी
रुस्वाई भी लगती नहीं रुस्वाई हमारी,
हम देख के दुनिया भी तुझे देख न पाए
बेकार पड़ी रह गई बीनाई हमारी,
लगता है बिछड़ कर भी नज़र आते रहेंगे
है उस के महल्ले में शनासाई हमारी,
हम तेरे ख़यालों में भटकते रहे बेजा
आवाज़ लगाती रही तन्हाई हमारी,
अब सब से मुसव्विर का पता पूछ रहा है
इतनी उसे तस्वीर पसंद आई हमारी,
रुस्वाई पे हम नाज़ करें क्यों न बताएँ
जब आप से मंसूब है रुस्वाई हमारी..!!
~इब्राहीम अली ज़ीशान
यूँ भरम अपनी अमीरी का बना रखा है
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