एक मुसलसल से इम्तिहान में हूँ
जबसे या रब मैं तेरे इस जहान में हूँ,
सिर्फ़ इतना सा है क़सूर मेरा
मैं नहीं वो हूँ जिस गुमान में हूँ,
कौन पहुँचा है आसमानों तक
एक सदी से बस उड़ान में हूँ,
जिस खता ने ज़मीन पर पटका
ढीठ ऐसा कि फिर उसी ध्यान में हूँ,
अपने किस्से में भी यूँ लगता है
मैं किसी और दास्तान में हूँ,
दर ओ दीवार भी नहीं सुनते
इतना तन्हा मैं इस मकान में हूँ,
ज़िन्दगी एक लिहाफ़ ए मलमली है
सर्द मौसम है और खीच तान में हूँ,
तौलती है मुझे यूँ सबकी नज़रे
जैसे मैं कोई जिन्स किसी दुकान में हूँ,
कोई भी समझा न यहाँ मेरी बात को
लगता है मैं किसी और ही ज़बान में हूँ..!!
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