चलो मंज़ूर है मुझको, मुझे कुछ भी सजा दे दो…

चलो मंज़ूर है मुझको
मुझे कुछ भी सजा दे दो
सुनो ! गर मिल नहीं पाए
तो एक दूजे से कहते है
कि क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी
हमारा दोष ही कब था ?
तुम्हे पाने की मैंने भी
बहुत कोशिश तो की लेकिन
मेरी मजबूरियाँ समझो
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम्हे मैं खो नहीं सकता
तुम्हारे साथ रह लूँगा
तुम्हारा हो नहीं सकता
तुम्हे मालूम तो है न ?
फ़क़त एक तुम ही ऐसी हो
जो मुझसे ख़ूब वाकिफ़ है
मुझे गर तुम न समझोगी
भला फिर कौन समझेगा ?

मेरा तुम साथ दोगी ना ?
कहो भी साथ दोगी ना ?
कि जबतक साँस बाकी है
रहेंगे राब्ते में हम
क़सम मेरी उठाओ तुम
कहीं ना तुम बदल जाना
मेरी अपनी भी दुनियाँ है
मगर तुम जानती तो हो
तुम्हे मैं जान कहता हूँ
तुम्हे ईमान कहता हूँ
मुझे तुम सबसे बढ़ कर हो
मगर फिर बात है वो ही
मेरी मजबूरियाँ समझो
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम्हारे साथ रह लूँगा
तुम्हारा हो नहीं सकता मगर
बगैर तेरे मैं जी भी नहीं सकता….

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