जब दुश्मनों के चार सू लश्कर निकल पड़े
हम भी कफ़न बाँध के सर पर निकल पड़े,
जिन दोस्तों पे नाज़ था हमको बहुत मियाँ
उनकी ही आस्तीन में खंज़र निकल पड़े,
बाहर के दुश्मनोसे तो महफूज़ थे मगर
दुश्मन हमारे घर के ही अंदर निकल पड़े,
सहराओ में ढूँढते है दुआओं के वास्ते
शायद कोई फ़कीर कलंदर निकल पड़े,
उस कौम का वज़ूद नहीं कुछ जहान में
गद्दार जिसमे कौम का रहबर निकल पड़े,
हम तुम्हारी याद में रो दे तो आज भी
आँखों से आँसूओ का समन्दर निकल पड़े..!!
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