इश्क़ जब एक मगरूर से हुआ तो फिर
छोड़ कर अना ख़ुद को झुकाना पड़ा मुझे,
उसने खेला था खिलौना समझ कर दिल को
ना चाह कर इश्क़ का रोग लगाना पड़ा मुझे,
देख कर बेवफ़ाई में उसकी बुलंदियाँ नवाब
ख़ुद को उसकी निगाहों में गिराना पड़ा मुझे,
उसकी ख़ुशी की खातिर छुपा कर अश्क़ भी
दिल की लगी को दिल्लगी बताना पड़ा मुझे,
ख़ुदा ना करे उसे भी मिले वो दर्द ओ अलम
जिन दर्द ओ गम को इश्क़ में उठाना पड़ा मुझे,
दिल तोड़ कर हर बार इशारा तो किया उसने
फिर भी आख़िरी सितम समझ निभाना पड़ा मुझे..!!
~नवाब ए हिन्द
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