गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है
सूरज से तेरा रंग ए हिना कम तो नहीं है,
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ
हर चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है,
चाहे वो किसी का हो लहू दामन ए गुल पर
सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है,
इतनी भी हमें बंदिश ए ग़म कब थी गवारा
पर्दे में तेरी काकुल ए पुरख़म तो नहीं है,
अब कारगह ए दहर में लगता है बहुत दिल
ऐ दोस्त कहीं ये भी तेरा ग़म तो नहीं है,
सहरा में बगूला भी है मजरूह सबा भी
हम सा कोई आवारा ए आलम तो नहीं है..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने
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