दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा

दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा
लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा,

रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में
दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा,

रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही
कोई साया मेरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा,

मिट गया पर तेरी बाँहों ने समेटा न मुझे
शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा,

लम्हा लम्हा रहे आँखों में अँधेरे लेकिन
कोई सूरज मेरे सीने में उभरता ही रहा..!!

~जाँ निसार अख़्तर

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