बहुत रौशन है शाम ए ग़म हमारी
किसी की याद है हमदम हमारी,
ग़लत है ला तअल्लुक़ हैं चमन से
तुम्हारे फूल और शबनम हमारी,
ये पलकों पर नए आँसू नहीं हैं
अज़ल से आँख है पुरनम हमारी,
हर एक लब पर तबस्सुम देखने की
तमन्ना कब हुई है कम हमारी ?
कही है हम ने ख़ुद से भी बहुत कम
न पूछो दास्तान ए ग़म हमारी..!!
~हबीब जालिब
कम पुराना बहुत नया था फ़िराक़
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